कृष्णा पुस्तक (मराठी)
अपने मामा कंस के कारागार में जहाँ उनके माता-पिता बन्द थे, कृष्ण ने अपनी माता के शरीर के बाहर चतुर्भुज विष्णु-नारायण के रूप में अवतार लिया। फिर वे एक शिशु बन गए और अपने पिता से बोले कि वे उन्हें नन्द महाराज तथा उनकी पत्नी यशोदा के घर ले जाएँ। जब कृष्ण छोटे शिशु ही थे, तब भीमकाय राक्षसी पूतना ने उन्हें मारने का प्रयास किया, लेकिन जब उन्होंने उसका स्तनपान किया, तो उसके प्राणों को खींच लिया। यही वास्तविक भगवान् और रहस्यवादी कारखाने में निर्मित भगवान् के बीच का अन्तर है। कृष्ण को रहस्यवादी योग पद्धति का अभ्यास करने का अवसर नहीं मिला, फिर भी उन्होंने प्रत्येक चरण पर, शैशवावस्था से बाल्यावस्था तक, बाल्यावस्था से किशोरावस्था तक और किशोरावस्था से युवावस्था तक स्वयं को परम पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में प्रकट किया। इस पुस्तक, कृष्ण में, एक मनुष्य के रूप में उनके सभी कार्यों का वर्णन किया गया है। यद्यपि कृष्ण एक मनुष्य के रूप में लीलाएँ करते हैं, वे हमेशा परम पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में अपनी पहचान बनाए रखते हैं।